त्राटक


त्राटक भी ध्यान का एक अंग है अथवा यों कहिए कि त्राटक का ही एक अंग ध्यान है। आन्तर त्राटक और बाह्य त्राटक दोनों का उद्देश्य मन को एकाग्र करना है। नेत्र बन्द करके किसी एक वस्तु पर भावना को जमाने और उसे आन्तरिक नेत्रों से देखते रहने की क्रिया आन्तर त्राटक कहलाती है।

बाह्य त्राटक का उद्देश्य बाह्य साधनों के आधार पर मन को वश में करना एवं चित्त- प्रवृत्तियों का एकीकरण करना है। मन की शक्ति प्रधानतया नेत्रों द्वारा बाहर आती है। दृष्टि को किसी विशेष वस्तु पर जमाकर उसमें मन को तन्मयतापूर्वक प्रवेश कराने से नेत्रों द्वारा विकीर्ण होने वाला मनःतेज एवं विद्युत् प्रवाह एक स्थान पर केन्द्रीभूत होने लगता है। इससे एक तो एकाग्रता बढ़ती है, दूसरे नेत्रों का प्रवाह- चुम्बकत्व बढ़ जाता है। ऐसी बढ़ी हुई आकर्षण शक्ति वाली दृष्टि कोबेधक दृष्टिकहते हैं।

बेधक दृष्टि द्वारा किसी के अन्तःकरण में भीतर तक प्रवेश करके उसकी सारी मनःस्थिति को, मनोगत भावनाओं को जाना जा सकता है। नेत्रों में ऐसा चुम्बकत्व त्राटक द्वारा पैदा हो सकता है। मन की एकाग्रता, चूँकि त्राटक के अभ्यास में अनिवार्य रूप से करनी पड़ती है, इसलिए उसका साधन साथ- साथ होते चलने से मन पर बहुत कुछ काबू हो सकता है।
Courtesy Yoga International
                                                        तथा
गो- घृत का दीपक जलाकर नेत्रों की सीध में चार फुट की दूरी पर रखिए। दीपक की लौ आधा इञ्च से कम उठी हुई हो, इसलिए मोटी बत्ती डालना और पिघला हुआ घृत भरना आवश्यक है। बिना पलक झपकाए इस अग्निशिखा पर दृष्टिपात कीजिए और भावना कीजिए कि आपके नेत्रों की ज्योति दीपक की लौ से टकराकर उसी में घुली जा रही है।

एक हाथ लम्बा- एक हाथ चौड़ा चौकोर कागज का पुट्ठा लेकर उसके बीच में रुपए के बराबर एक काला गोल निशान बना लो। स्याही एक सी हो, कहीं कम- ज्यादा हो। इसके बीच में सरसों के बराबर निशान छोड़ दो और उसमें पीला रंग भर दो। अब उससे चार फीट की दूरी पर इस प्रकार बैठो कि वह काला गोला तुम्हारी आँखों के सामने, सीध में रहे।

साधना का एक कमरा ऐसा होना चाहिए जिसमें अधिक प्रकाश रहे, अँधेरा; अधिक सर्दी हो, गर्मी। पालथी मारकर, मेरुदण्ड सीधा रखते हुए बैठो और काले गोले के बीच में जो पीला निशान हो, उस पर दृष्टि जमाओ। चित्त की सारी भावनाएँ एकत्रित करके उस बिन्दु को इस प्रकार देखो, मानो तुम अपनी सारी शक्ति नेत्रों द्वारा उसमें प्रवेश कर देना चाहते हो। ऐसा सोचते रहो कि मेरी तीक्ष्ण दृष्टि से इस बिन्दु में छेद हुआ जा रहा है। कुछ देर इस प्रकार देखने से आँखों में दर्द होने लगेगा और पानी बहने लगेगा, तब अभ्यास बन्द कर दो।

अभ्यास के लिए प्रातःकाल का समय ठीक है। पहले दिन देखो कि कितनी देर में आँखें थक जाती हैं और पानी जाता है। पहले दिन जितनी देर अभ्यास किया है, प्रतिदिन उससे एक या आधी मिनट बढ़ाते जाओ।

दृष्टि को स्थिर करने पर तुम देखोगे कि उस काले गोले में तरह- तरह की आकृतियाँ पैदा होती हैं। कभी वह सफेद रंग का हो जाएगा तो कभी सुनहरा। कभी छोटा मालूम पड़ेगा, कभी चिनगारियाँ- सी उड़़ती दीखेंगी, कभी बादल- से छाए हुए प्रतीत होंगे। इस प्रकार यह गोला अपनी आकृति बदलता रहेगा, किन्तु जैसे- जैसे दृष्टि स्थिर होना शुरू हो जाएगी, उसमें दीखने वाली विभिन्न आकृतियाँ बन्द हो जाएँगी और बहुत देर तक देखते रहने पर भी गोला ज्यों का त्यों बना रहेगा।


प्रातःकाल के सुनहरे सूर्य पर या रात्रि को चन्द्रमा पर भी त्राटक किया जाता है। सूर्य या चन्द्रमा जब मध्य आकाश में होंगे तब त्राटक नहीं हो सकता। कारण कि उस समय तो सिर ऊपर को करना पड़ेगा या लेटकर ऊपर को आँखें करनी पड़ेंगी; ये दोनों ही स्थितियाँ हानिकारक हैं, इसलिए उदय होता सूर्य या चन्द्रमा ही त्राटक के लिए उपयुक्त माना जाता है।

त्राटक के अभ्यास के लिए स्वस्थ नेत्रों का होना आवश्यक है। जिनके नेत्र कमजोर हों या कोई रोग हो, उन्हें बाह्य त्राटक की अपेक्षा आन्तर त्राटक उपयुक्त है। आन्तर त्राटक को पाश्चात्य योगी इस प्रकार करते हैं कि दीपक की अग्निशिखा, सूर्य- चन्द्रमा आदि कोई चमकता प्रकाश पन्द्रह सेकेण्ड खुले नेत्रों से देखा, फिर आँखें बन्द कर लीं और ध्यान किया कि वह प्रकाश मेरे सामने मौजूद है। एकटक दृष्टि से मैं उसे घूर रहा हूँ तथा अपनी सारी इच्छाशक्ति को तेज नोंकदार कील की तरह उसमें घुसाकर आर- पार कर रहाहूँ।

इससे मन एकाग्र होता है और दृष्टि में बेधकता, पारदर्शिता एवं प्रभावोत्पादकता की अभिवृद्धि होती है।

त्राटक पर से उठने के पश्चात् स्वच्छ छना हुआ ताजा पानी से आँखों को धो डालना चाहिए। कटोरी में पानी भरके उसमें आँखें खोलकर डुबाने और पलक हिलाने से आँखें धुल जाती हैं। इस प्रकार के नेत्र स्नान से त्राटक के कारण उत्पन्न हुई आँखों की उष्णता शान्त हो जाती है। त्राटक का अभ्यास समाप्त करने के उपरान्त साधना के कारण बढ़ी हुई मानसिक गर्मी के समाधान के लिए दूध, दही, लस्सी, मक्खन, मिश्री, फल, शर्बत, ठण्डाई आदि कोई ठण्डी पौष्टिक चीजें, ऋतु का ध्यान रखते हुए सेवन करनी चाहिए। जाड़े के दिनों में बादाम का हलुवा, च्यवनप्राश आदि वस्तुएँ भी उपयोगी होती हैं। 

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